Saturday, February 19, 2011

शहर -गुलाल (Shahar- Gulaal)

फिल्म: गुलाल
साल: २००९
गीत: शहर
गीतकार: पियूष मिश्रा
संगीतकार: पियूष मिश्रा




ए  एक  बखत (वक़्त)  की  बात  बताएं,
एक  बखत (वक़्त) की,
जब  शहर हमारो सो गयो थो
वो  रात गजब की वो रात गजब की
हे चहुँ और सब और दिसा से लाली छाई रे
जुगनी नाचे चुनर ओढ़े, खून नहाई रे
चहुँ और सब और दिसा से लाली छाई रे
जुगनी नाचे चुनर ओढ़े, खून नहाई रे
सब ओरों गुलाल पुत गयो, सब ओरों में
हे सब ओरों गुलाल पुत गयो, बिपदा छाई रे
जिस रात गगन से खून की बारिस आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिस आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिस आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिस आई रे
सराबोर हो गयो शहर और सराबोर हो गयी धरा
सराबोर हो गयो रे जत्था इंसानों का पड़ा पड़ा
सभी जगत ये पूछे था, जब इतना सब कुछ हो रह्यो थो
तोह शहर हमारा काहे भाइसा आँख मूँद के सो रह्यो थो
तो शहर ये बोल्यो नींद गजब की ऐसी आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिस आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिस आई रे
जिस रात शहर में खून की बारिस आई रे

सन्नाटा वीराना, ख़ामोशी अनजानी
जिंदगी लेती है, करवटें तूफानी
घिरते हैं साए घनेरे से
रूखे बालों को बिखेरे से
बढ़ते हैं अँधेरे पिशाचों से
काँपे  हैं जी उनके नाचों से
कहीं पे वो जूतों की खट खट है
कहीं पे अलावों की चट पट है
कहीं पे हैं झींगुर की आवाजें
कहीं पे वो नलके की टप टप है
कहीं पे वो खाली सी खिड़की है
कहीं वो अँधेरी सी चिमनी है
कहीं हिलते पेड़ों का जत्था है
कहीं कुछ मुंडेरों पे रखा है

सुनसान गली के नुक्कड़ पर जो कोई कुत्ता
चीख चीख कर रोता है
जब लेम्प पोस्ट की गंदली पीली घुप रौशनी
में कुछ कुछ सा होता है
जब कोई साया खुद को थोडा बचा बचा कर
गुम सायों में खोता है
जब पुल के खम्बों को गाडी का गरम उजाला
धीमे धीमे धोता है
तब शहर हमारा सोता है
तब शहर हमारा सोता है
तब शहर हमारा सोता है

जब शहर हमारा सोता है तो मालुम तुमको
हाँ क्या  क्या  क्या होता है
इधर जागती हैं लाशें
जिंदा हो मुर्दा उधर ज़िन्दगी खोता है
इधर चीखती है इक हौउआ       
खैराती उस अस्पताल में बिफरी सी
हाथ  में उनके अगले ही पल
गरम मांस का नरम लोथड़ा होता है
इधर उठी हैं तकरारें
जिस्मों के झट पट लेन देन में ऊँची  सी
उधर घाव से रिसते खूं  को दूर गुज़रती आँखें देखें रूखी सी
लेकिन उसको  लेके रंग बिरंगे महलों में गुंजाइश होती है
नशे में डूबे सेहन से खूंखार चुटकुलों की पैदाइश होती है
अधनंगे जिस्मों की देखो लिपि पुती सी लगी नुमाइश होती है
लार टपकते चेहरों को कुछ शैतानी करने की  ख्वाहिश होती है
वो पूछें हैं हैरां हो कर ऐसा सब कुछ होता है कब
वो बतलाओ तो उनको ऐसा तब तब तब तब होता है
जब शहर हमारा सोता है
जब शहर हमारा सोता है